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Wednesday, June 11, 2014

महत्व का महत्व 06-11

हमारे मित्र प्रिंस पाण्डेय जी की लिखी कविता हमें पसंद आई।
सोचा आप लोगों के साथ शेयर करु आशा हैं आपको पसंद आएगी


"बड़ा महत्व है एक बार पढ़ के तो देखो"
ससुराल में साली का
बाग़ में माली का
होंठो में लाली का
पुलिस में गाली का
मकान में नाली का
कान में बाली का
पूजा में थाली का
खुशी में ताली का------बड़ा महत्व है
फलों में आम का
भगवान में राम का
मयखाने में जाम का
फैक्ट्री में काम का
सुर्ख़ियों में नाम का
बाज़ार में दाम का
मोहब्ब्त में शाम का-------बड़ा महत्व है
व्यापार में घाटा का
लड़ाई में चांटा का
रईसों में टाटा का
जूतों में बाटा का
रसोई में आटा का-----बड़ा महत्व है
फ़िल्म में गाने का
झगड़े में थाने का
प्यार में पाने का
अंधों में काने का
परिंदों में दाने का-----बड़ा महत्व है
ज़िंदगी में मोहब्ब्त का
परिवार में इज्ज़त का
तरक्की में किसमत का
दीवानो में हसरत का------बड़ा महत्व है
पंछियों में बसेरे का
दुनिया में सवेरे का
डगर में उजेरे का
शादी में फेरे का------बड़ा महत्व है
खेलों में क्रिकेट का
विमानों में जेट का
शारीर में पेट का
दूरसंचार में नेट का-----बड़ा महत्व है
मौजों में किनारों का
गुर्वतों में सहारों का
दुनिया में नज़ारों का
प्यार में इशारों का------बड़ा महत्व है
खेत में फसल का
तालाब में कमल का
उधार में असल का
परीक्षा में नकल का-----बड़ा महत्व है
ससुराल में जमाई का
परदेश में कमाई का
जाड़े में रजाई का
दूध में मलाई का -----बड़ा महत्व है
बंदूक में गोली का
पूजा में रोली का
समाज में बोली का
त्योहारों में होली का
श्रृंगार में चोली का-----बड़ा महत्व है
बारात में दूल्हे का
हड्डियों में कूल्हे का
रसोई में चूल्हे का-------बड़ा महत्व है
सब्जियों में आलू का
बिहार में लालू का
मशाले में बालू का
जंगल में भालू का
बोलने में तालू का-------बड़ा महत्व है
मौसम में सावन का
घर में आँगन का
दुआ में दामन का
लंका में रावन का-------बड़ा महत्व है
चमन में बहार का
डोली में कहार का
खाने में अचार का
मकान में दीवार का-----बड़ा महत्व है
सलाद में मूली का
फूलों में जूली का
सज़ा में सूली का
स्टेशन में कूली का------बड़ा महत्व है
पकवानों में पूरी का
रिश्तों में दूरी का
आँखों में भूरी का
रसोई में छूरी का ----बड़ा महत्व है
और आखिरी आपके लिए:-
खेत में साप का
सिलाई में नाप का
खानदान में बाप का
और
फेसबुक पर आप का----
बड़ा महत्व है
कैसा लगा महत्व दोस्तो???

Tuesday, April 29, 2014

कोसनों के परोसे 04-30

कोसनों के परोसे
—चौं रे चम्पू! जे नेता लोग बोलिबे ते पहलै कछू सोचैं ऐं कै नायं?
—चचा, मुझे लगता है कि गालियां बोलने और कोसनों के परोसने से पहले, उन्हें बनाने वाली कोई टीम ज़रूर काम करती होगी।
—का काम कत्ती होयगी?
—देखती होगी कानूनी दाव-पेच। कह भी दो, पर पकड़ में भी न आओ। एक ने नमूना कह दिया। अब देखा जाए तो नमूना मॉडल को कहते हैं। गुजरात मॉडल की जगह गुजरात-नमूना कह दो तो कठोर बोल बन सकता है, पर पकड़ में नहीं आएगा। चूहों की तरह दौड़ना कहने में भी कानून नहीं पकड़ सकता। सीधे चूहा कहा होता तो शायद चोट सीधी होती। सम्बोधनों का भी आनन्द पूरा लिया जा रहा है। पप्पू, फेंकू, नमो, रागा, शहजादा, दामादश्री ऐसे सम्बोधन हैं जिन पर कानून कुछ बोल नहीं सकता। डैमोक्रेसी में यही व्यंग्य का रंग है। बाबा की टीम बुद्धि नहीं लगाती या ये भी कह सकते हैं कि बाबा ने अपनी बुद्धि का ठेका किसी को नहीं दिया। किसी घर-गृहस्थ ने तो हनीमून का जिक्र नहीं किया। बाबा कर बैठा। वह भी दलितों के संदर्भ में। कस गया कानून का शिकंजा। फिलहाल कड़वे बोलों का बोलबाला जारी रहेगा चचा। एक-दूसरे को तिलमिलाने का ज़माना है। दिल-मिलाने का ज़माना आएगा सोलह तारीख के बाद। सब भूल जाएंगे किस ने किस को कितनी गालियां दीं। अभी तो वृषभ-युद्ध जारी है, दर्शक आनन्द ले रहे हैं। मोदी नाम की नई व्याख्या हुई है। मॉडल ऑफ डिवाइडिंग इंडिया। मोदी ने आरएसवीपी का कर दिया राहुल, सोनिया, वाड्रा, प्रियंका। व्यक्तिगत आरोपों की तोपों से बड़ी खोजपूर्ण उक्तियां निकल रही हैं। कितने दिमाग़ लगे होंगे इसके पीछे चचा, आप अन्दाज़ा नहीं लगा सकते। माहौल गंभीर रूप से अगंभीर है। मुद्दों के गुद्दे सूख कर ठूंठ हो चुके हैं, बेतुके बोलों की बेलों पर बहार आ रही है। मेरा एक मन है चचा।
—बता का ऐ तेरौ मन?
—मैं चाहता हूं कि इन राजनेताओं की सुविधा के लिए कोसनों का एक परोसा बनाऊं। जिसको जो पसन्द हो ले जाए और बगीची के दानकोष की रसीद कटवा ले। वैसे हमारे ब्रज में कोसनों की कमी नहीं है। उन्हीं को संशोधित किया जा सकता है। जैसे कलई खुल जाएगी अगर तेरे मुंह में कलई करा दी। हवा सीटी बजाएगी अगर ज़्यादा मुंह खोला। ख़ुदा करे जैसे अपनी बीवी को भूल गया, वैसे ही प्रेमिकाओं के नाम भी भूल जाए। ख़ुजाने के लिए ख़रैरा रख ले, बांह चढ़ाने से क्या होगा। जब तू लौटे तो अपनी भाषा ही भूल जाए। जब खाना खाए तो तेरी आंख तश्तरी में गिर जाए। जिस-जिस ने ज़मीन ख़रीदी, धरती दिवस पर उनकी धरती खिसक जाए।
—इन कोसनन में कोई दम नायं। सीधी मारकाट चल रई ऐ। इत्तौ दिमाग कोई नायं लगायगौ!
—चलो फिर मैं आपको सम्बोधन के रूप में कुछ शब्द और शब्दयुग्म देता हूं, इनका प्रयोग किया जा सकता है। जैसे छिनट्टे, गुल्लू के पट्ठे, भ्रष्ट भूसाचारी, पचरंगी अचारी, मोटी के मृदंग, नंगधड़ंग, कुर्सी के कुसंगी, तोता-तिरंगी, सड़े हुए सैम्पिल, स्टील की सैंडिल, मिस्टर उड़ंछू, बेतुके बिच्छू, कटी बांह के कुर्ते, बेगुन भुर्ते…
—रहन्दै, रहन्दै! सम्बोधन सब्दन के बार-बार पलटिबे ते नायं आमैं, पलटबार ते आयौ करैं। तू तौ जे बता कै चुनाव की आचार संघिता का बोलै?
—आचार संहिता का पालन कौन कर रहा है चचा! वहां तो सीधे कहा गया है कि कोई दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले। राजनीतिक दलों को आलोचना के समय कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित रहना चाहिए न कि व्यक्तिगत आरोप लगाएं। मत पाने के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि। किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार, अहाते या भूमि का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। किसी दल की सभा या जुलूस में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। लेकिन चचा, सब कुछ धड़ल्ले से हो रहा है। आचार संहिता के उल्लंघन को दिन-रात टी.वी. चैनलों पर दिखाना भी सरासर उल्लंघन है। आचार संहिता कहती है कि राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं कर सकते, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाओं को चोट पहुंचती हो। पर हो क्या रहा है देख लो।
—चोट की छोड़, बोट पड़नी चइऐ डंके की चोट।
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Friday, April 25, 2014

ठंडा गन्ने का जूस 04-25

अशोक चक्रधर भैया ने क्रोध अहंकार और गन्ने के जूस को आधारित कर एक कविता लिखी हमने भी उसका जवाब अपने दिवानिया स्टाइल में दिया। जो नीचे प्रस्तुत हैं।

श्याम का जवाब ,

मन्ने भी दे दो  भैया,
झटपट गन्ने का जूस।

पीलिया को भी पिलिओ भैया ,

ये ठंडा गन्ने का जूस।

उदा दे ये भैया अहंकार ,

और क्रोध का भी फ्यूज।

मन्ने भी दे दो भैया  ,

झटपट गन्ने का जूस।

अशोक चक्रधर जी की कविता

अहंकार में आकर बढ़ता है,
क्रोध सबसे जल्दी सीढ़ी चढ़ता है।
चढ़ता ही जाए
बढ़ता ही जाए
तो लाल से हो जाता है
ज़हरीला नीला,
नीचे उतरे तो लाल से पीला।
उस पीली आग को नहीं चाहिए
ज़रा सी भी फूस,
पीलिया को चाहिए
गन्ने का जूस!

     

Saturday, April 5, 2014

संवेदनशील कविता 04-05



अशोक चक्रधर भैया ने एक संवेदनाशील कविता लिखी उसके जवाब में हमने भी कुछ पंक्तीयाँ लिखी आशा हैं आपको पसंद आएंगी। (श्याम)


इतनी संवेदनशील कविता लिखते हैं क्यूँ आप,
आंसू सारे महंगाई को रोते सूख  गए ,

अब लाये कहाँ से आंसू .
वैसे भी मुस्कान का बड़ा अभाव  हैं,

कुछ ऐसा लिखिए श्रीमान की,
मुस्कान कि बाढ़ आजाये चक्रधर  मेहरबान।

कैसे अशोक हैं आप ???

एक अशोक था जिसने शोक फैलाया तलवार कि धार से,
और एक आप हैं जो फैला रहे हैं, कलम के वार से।

देश काल परिस्तिथि, खुद एक शोक सागर हैं,
भवसागर ही भवसागर हैं, भाव सागर कि आवश्यकता नहीं थी।

क्यों किया वार आपने जनता पर, जो हैं निहत्ते और निढ़ाल।

अब तक रही हैं जनता आपकी ओर, चकोर दृस्टी से,
कि "अशोक" शोक का संहार करे, अपने शब्द बाण से।

कविता एक पर्व ख़ुशी का हैं, मौसम-ए- मातम नहीं।

हिंदी कविता , श्याम, श्यामसुंदर पंचवटी , अशोक चक्रधर 

अशोक चक्रधर बय्या की कविता 


मेरा नाम है माया,
मैंने अभी खाना नहीं खाया।
पिंकी पी चुकी है दुद्धू,
हमीं हैं बुद्धू।
मेरी तीन बहनें हैं
दो बड़ी एक छोटी,
मां सेक रही है रोटी।
सेक कर गिनेगी,
अच्छी अच्छी चुनेगी।
पहले भैया और बाबा को
खिलाएगी,
फिर हमारी बारी आएगी।
बड़ी बहनें चौराहे पर
घुमाएंगी कटोरा,
बाबा गिनेगा, कितना बटोरा?
बहनें शाम तक
लगी रहेंगी धंधे पर,
में पिंकी को झुलाऊंगी कंधे पर।
भाई को भीख नहीं मिलती
तो गुस्सा हो जाता है,
पिंकी की जाली ओढ़ के
सो जाता है।
मैं पिंकी को उछालती हूं
भाई गालियां बकते हुए
जाली को उछालता है।
मैं पिंकी को पालती हूं
वो गुस्से को पालता है।
भरतपुर वाला गाना सुन के
पिंकी सो जाती है,
भाई लात मारता है
तो फ़जीहत हो जाती है।
मैं उसे लड़-झगड़ कर
भगाती हूं,
पिंकी को फिर से
लुटने की लोरी
सुना कर सुलाती हूं।
जाली में लग रही है
कितनी प्यारी,
मेरी पिंकी पिंकी
राजकुमारी!
भाई आ जाए तो
यहां बिठाऊंगी,
फिर भगवान जी का
कौर निकाल के
मैं भी खाऊंगी!